Saturday, December 6, 2008

"वक्त नहीं "
हर ख़ुशी है लोगों के दमन में,
पर एक हंसी के लिए वक्त नहीं.
दीन रात दौड़ती दुनिया में,
जिंदगी के लिए ही वक्त नहीं.

माँ की लोरी का एहसास तो है,
पर माँ को माँ कहने का वक्त नहीं.
सारे रिश्तों को तो हम मार चुके,
अब उन्हें दफ़नाने का भी वक्त नहीं.
सारे नाम मोबाइल में हैं,
पर दोस्ती के लिए वक्त नहीं.
गैरों की क्या बात करें,
जब अपनों के लिए ही वक्त नहीं.

आँखों में है नींद बड़ी,
पर सोने का वक्त नहीं.
दिल है ग़मों से भरा ,
पर रोने का भी वक्त नहीं.
पैसों की दौड़ में ऐसे दौडे,
की थकने का भी वक्त नहीं.
पराये एहसासों की क्या कद्र करें,
जब अपने सपनो के लिए ही वक्त नहीं.

तू ही बता इ जिंदगी,
इस जिंदगी का क्या होगा,�
की हर पल मरने वालों को,
जीने के लिए भी वक्त नहीं..........

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